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महिला दिवस पर निबंध हिंदी में – Essay on International Women’s Day in Hindi

Essay on International Women’s Day in Hindi : नमस्कार दोस्तों, हर साल 8 मार्च को समस्त विश्व महिला दिवस के रुप में मनाता है. महिला दिवस का मतलब है वह दिन जो महिलाओं को सम्मान देने के लिए बना है. क्या यह जरूरी है कि महिलाओं को सम्मान सिर्फ एक ही दिन दिया जाए. क्या बाकी बचे साल के 364 दिन महिलाएं सम्मान की हकदार नहीं है? आज हम आपसे इसी बारे में बात करने के लिए यहां पर हैं. तो आइए शुरू करते हैं एक ऐसी राह जो हमें महिलाओं की आज आज की स्थिति से रूबरू करवाती हैं.

भारत एक ऐसा सांस्कृतिक देश है जहां नारी के सम्मान को बहुत महत्व दिया जाता है. इतना ही नहीं संस्कृत में एक श्लोक है ‘यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता:। इस श्लोक का अर्थ यह है कि जहां पर नारी की पूजा होती है उस जगह पर स्वयं भगवान निवास करते हैं. परंतु आज के समाज में नारी का हर जगह अपमान हो रहा है. नारी को एक इस्तेमाल की जाने वाली वस्तु समझ लिया गया है. हर दूसरा व्यक्ति नारी को अपने तरीकों से इस्तेमाल करने की कोशिश करता है जो कि बहुत ही अपमानजनक और चिंताजनक बात है. आज की दशा को देखते हुए यह बहुत जरूरी है कि हम नारी के सम्मान को बचाएं और अपने देश की संस्कृति का भी पालन करें.

माता का सम्मान करना जरूरी है

मां का मतलब होता है माता के रूप में वह नारी जिसने हमें इस दुनिया में जन्म दिया है. माता को धरती पर सबसे ऊंचा और पवित्र स्थान दिया गया है और मां को ईश्वर से भी बढ़कर माना जाता है क्योंकि ईश्वर को जन्म देने वाली भी एक मां ही है. जैसे कि श्री कृष्ण भगवान को माता देवकी ने जन्म दिया उसी प्रकार श्री गणपति भगवान और कार्तिकेय भगवान को माता पार्वती ने जन्म दिया है. इसीलिए माता को ईश्वर का दर्जा दिया जाता है.

लेकिन आज के समय में यह दर्जा कम होने लगा है. संतान अपनी माता की इज्जत करना और उन्हें महत्व देना भूलती जा रही है. हर कोई अपने स्वार्थ में इतना डूब गया है कि वह अपने आदर्श और धर्मों से परे हो गया है. चाहे समाज कितना भी बदल जाए यह जरूरी है कि माता को उनका सम्मान उसी तरह मिले जिस तरह मिलना चाहिए. इसके लिए बहुत जरूरी है कि हम अपनी आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी को बड़ों का सम्मान और नारी की इज्जत के लिए अच्छी शिक्षा दें. और यह समझाएं कि माता का सम्मान करना और नारी को इज्जत देना ही हमारा धर्म और कर्तव्य है.

आज हर जगह आगे बढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं लड़कियां

बदलते दौर के साथ बहुत सी चीजें बदल रही है. आज के युग में लड़कियां लड़कों से कम नहीं है. बल्कि देखा जाए तो हर क्षेत्र में लड़कियां लड़कों से आगे ही दिखेंगे. एक समय में लड़कियों को कमजोर माना जाता था लेकिन अगर हम आज देखे तो हर प्रकार की परीक्षाओं में लड़कियों का नाम मेरिट लिस्ट में सबसे ऊपर होता है और इतना ही नहीं अगर हम सेना की या भारतीय एयरपोर्ट की बात भी क्यों ना करें वह भी लड़कियों का बल और उनकी मेधा शक्ति बढ़ चढ़कर दिख रही है. महिलाओं की बढ़ती शक्ति और उनके इस आत्मविश्वास की हम सबको इज्जत करनी चाहिए हमें नहीं समझना चाहिए कि लड़कियां किसी भी मायने में किसी से भी कम है.

कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है लड़कियां

अगर हम शुरुआत से देखें तो नारी का समस्त जीवन पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में ही बीत जाता है. पहले लड़कियां अपने पिता के अनुसार उनकी छत्रछाया में अपना बचपन बिताते हैं और उसके बाद उन्हें अपने पिता के घर में भी कामकाज करके अपनी पढ़ाई को जारी रखना होता है. और उनका फिर यही जीवन चक्र उनकी शादी तक चलता रहता है. इस समय के दौरान लड़कियों को घर के कामकाज के साथ साथ पढ़ाई लिखाई की भी जिम्मेदारी निभानी होती है. अगर लड़कों की बात की जाए तो उन्हें पढ़ाई लिखाई के अलावा कोई और ऐसी जिम्मेदारी नहीं दी जाती. बल्कि बहुत से लड़के तो ऐसे भी होते हैं जो ढंग से पढ़ाई तक नहीं करते बल्कि उन्हें इसके अलावा कोई काम नहीं दिया जाता. कहां तो यही जाता है कि महिलाएं पुरुषों से कंधा मिलाकर चलती है लेकिन अगर सच्चाई की तरफ रुख किया जाए तो यही दिखता है कि जिम्मेदारियों का निर्वहन महिलाओं पर ज्यादा होता है. उनके इसी साहस का हमें सम्मान करना चाहिए और उन्हें कद्र देनी चाहिए.

विवाह के बाद महिलाओं की जिंदगी

, Mahila Diwas Nibandh

शादी होने के बाद तो एक औरत की जिम्मेदारियां और भी बढ़ जाती है. शादी करके अपने ससुराल आने के बाद लड़की को अपने पति सास-ससुर देवर ननद की सेवा करनी होती है तथा अपनी जिम्मेदारियों का भी पालन करना होता है. इस सब के चलते वह अपने लिए ना तो समय निकाल पाती है और ना अपनी और ध्यान दे पाती है. महिला एक कोल्हू के बैल की तरह बस अपने घर परिवार की जिम्मेदारियों में ही रह जाती है. घर परिवार में जिम्मेदारियां निभाते निभाते तू ले चुके को संभालते महिला का जीवन कब भी जाता है उसे पता ही नहीं चलता. इतना ही नहीं संतान के पैदा होने के बाद जिम्मेदारियां और भी ज्यादा बढ़ जाती हैं. अपनी सभी जिम्मेदारियों का पालन करने के लिए एक स्त्री अपने कई सारे अरमानों का गला घोट देती है और बस यही सोचती है कि उसका घर एवं परिवार खुश रहे. वह अपने भले से ज्यादा अपने परिवार के भले और खुशहाली के लिए सोचती है. यहां तक कि महिलाओं को अपने लिए इतना भी समय नहीं मिलता कि वह खुद के लिए कुछ सुकून के पल निकाल सके. देखा जाए तो परिवार के लिए अपना समस्त जीवन दान में देने की कला महिलाओं को खूब आती है और इसमें भारतीय महिलाएं तो सब से ही आगे हैं. अपने परिवार के खातिर जो बलिदान महिलाएं करती हैं उनके लिए उन्हें अवश्य मिलना चाहिए.

बच्चों में संस्कार डालने का काम भी महिला ही करती है

अपने परिवार का पालन पोषण करने के साथ-साथ बच्चों के अंदर अच्छे संस्कार भरने की जिम्मेदारी भी एक मां की ही होती है. हम बचपन से ही यह बात सुनते आते हैं कि बच्चों की सबसे पहले गुरु उनकी माता होती है. माता के व्यक्तित्व का सीधा असर बच्चों पर पड़ता है. इसीलिए बहुत से लोग यह भी कहते हैं कि जैसी मां वैसी बच्चे.
इतिहास उठाकर देखा जाए तो पुतलीबाई ने गांधी जी व जीजाबाई ने शिवाजी महाराज जैसे श्रेष्ठ संस्कारों वाले व्यक्तियों को जन्म दिया और उन्हें एक अच्छी परवरिश उन्हें देश का सपूत बनाया. आज भी भारत में सभी लोग उन महान आत्माओं को उनके कर्मों की वजह से जानते हैं. लेकिन यह नहीं सोचते कि उनके कर्म उनकी माता की दी हुई थी और परवरिश का नतीजा थे. एक नारी ही अपने बच्चों को एक अच्छे संस्कार और परवरिश देकर समाज में उदाहरण बना सकती है.

अभद्रता की पराकाष्ठा

आजकल महिलाओं के साथ अभद्रता की पराकाष्ठा ही हो रही है हर जगह. चाहे हम टीवी चला ले या फिर अखबार पढ़ ले हर जगह हम यही सुनते एवं पढ़ते हैं कि एक जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की गई या फिर दूसरी जगह पर किसी महिला के साथ बलात्कार या फिर सामूहिक बलात्कार किया गया. जो हो रहा है इसे नैतिक पतन ना कहे तो क्या कहे. शायद ही ऐसा कोई दिन या फिर कहे तो घंटा जाता होगा जब हम यह सुनते हो कि किसी महिला के साथ अभद्र व्यवहार किया गया है. कभी सोचते हैं कि इस सब का कारण क्या है? दिन-प्रतिदिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया की वजह से लोगों में अश्लीलता बढ़ती जा रही है. इन सब चीजों का युवाओं के मन मस्तिष्क पर बहुत ही खराब प्रभाव पड़ रहा है जिसकी वजह से वह अपने विचारों में क्रियान्वयन और तामसिक प्रवृत्ति लाने लगे हैं. इन्हीं चीजों का परिणाम है दिल्ली जैसे बड़े शहरों में सामूहिक बलात्कार और घृणित कर देने वाले महिलाओं के साथ होते अपराध. कहां हमें इस देश में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कोई कदम उठाना चाहिए और कहां हम उन्हें के साथ बलात्कार और अपराध जैसी घिनौनी हरकते कर रहे हैं. आज सबके लिए बहुत जरूरी है कि वह नारी के सम्मान और उसके आत्मविश्वास की रक्षा करें. और उन्हें जीने का एक सही अधिकार भी दे. ताकि महिला अपने शहर में अपने देश में खुद में सुरक्षित महसूस कर सकें.

इतिहास में

बहुत सारी महान महिलाओं ने देश में अपने अच्छे कर्मों के कारण अपना नाम रोशन किया है. उन महिलाओं में देवी अहिल्याबाई होलकर, मदर टेरेसा, इला भट्ट, महादेवी वर्मा, राजकुमारी अमृत कौर, अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी और कस्तूरबा गांधी जैसी महान हत्या भी शामिल है. कस्तूरबा गांधी ना सिर्फ महात्मा गांधी के साथ खड़ी रही बल्कि उनका बाया हाथ बंद कर उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश को आजाद करवाने में एक अहम भूमिका भी निभाई. उन्होंने यह नहीं सोचा कि वह एक स्त्री हैं बल्कि यह सोचा कि वह अपने देश की बेटी है जिन्हें अपने देश के लिए अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन हर परिस्थिति में करना है. इसी प्रकार इंदिरा गांधी जी ने अपने संकल्प के आधार पर राजनीति में भारत व समस्त विश्व को प्रभावित किया और सबको उन्हें लौह-महिला कहने पर मजबूर कर दिया. इंदिरा गांधी ने अपने पिता पति एवं पुत्र सबको खोया लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी दृढ़ संकल्प को हिलने ना दिया और एक चट्टान की तरह अपने ऊपर आने वाली मुसीबतों का सामना करती रहे और अपनी एक पहचान बनाकर इस दुनिया से चली गई. आज भी लोग इंदिरा गांधी को एक आदर्श के रूप में जानते हैं और मानते भी हैं. इंदिरा गांधी राजनीति में ही माहिर नहीं थी बल्कि वह वाक्-चातुर्य में भी कुशल थी इसी कारण रोनाल्ड रेगन उन्हें चतुर महिला कहकर पुकारा करते थे.

आखिरी शब्द!!!

अंत में हम यही कहना चाहेंगे कि चाहे महिला किसी भी दौर में हो या किसी भी समय की यह हमारा कर्तव्य है कि हम उनका सम्मान करें उनकी रक्षा करें उनके आत्मसम्मान की रक्षा करें. महिलाओं को खुद से कम न समझ कर उन्हें समाज में वही दर्जा दे जिनके काबिल हैं. आज भी देश में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले कम है यह इसी वजह से है कि कई लोग बेटियों को बोझ समझते हैं. देखा जाए तो बेटों से ज्यादा तो जिम्मेदारियां बेटियां निभाती हैं. इतना ही नहीं वे परिवार का ही पालन नहीं करती बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी जन्म देती हैं. अगर बेटियां नहीं होंगी तो आने वाली पीढ़ी को जन्म कौन देगा? हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमारा जो यह अस्तित्व है वह किसी नारी के जन्म देने की वजह से ही है. इसलिए हमें नारी को ठुकराना नहीं चाहिए उनका अपमान नहीं करना चाहिए. भारतीय धर्म और संस्कृति में नारी को देवी दुर्गा लक्ष्मी जैसा सम्मान दिया गया है हमें उचित सम्मान को बढ़ावा देना चाहिए और नारी को वही स्थान भी देना चाहिए.

महिला दिवस 2019

Hindi Essay on Women’s Day, Mahila Diwas Nibandh